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स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय श्री हरिनन्दन प्रसाद सिंह

 Aस्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय श्री हरिनन्दन प्रसाद सिंह

       स्वर्गीय श्री हरिनन्दन प्रसाद सिंहजी का जन्म सन 1917 में श्री फिरंगी सिंहजी और श्रीमती लड्डू देवी के घर में खोजागाछी ग्राम में हुआ था!उनके एक बड़े भाई और दो बड़ी बहनें थी! दूध पीते बच्चे थे जब उनकी माँ गुज़र गयीं!दोनों बड़ी बहनों ने उन दोनों भाइयों की परवरिश की!


हरिनन्दन बाबू की प्राथमिक शिक्षा गांव में प्राइवेट शिक्षक से पढ़ कर हुई!

इंटर की पढ़ाई नालंदा कॉलेज, बिहारशरीफ़ से की!वो रोज़ाना गांव से ही आना -जाना करते थे!उनकी स्नातक की पढ़ाई टी एन बी कॉलेज, भागलपुर से किया!उसी दौरान सेना में भर्ती हुए!

कुछ वर्ष कार्यरत रहे,उन्हीं दौरान द्वितीय विश्व युद्ध की घोषणा हुई!सन 1939 में वे 22वर्ष के नौजवान थे!1939 से 1945  दूसरा विश्व युद्ध चला!बड़े भाई के निरंतर दवाब से झुकना पड़ा!वे उनका काफ़ी लिहाज करते थे और मोह भी था!

हरिनन्दन बाबू सेना की नौकरी से त्यागपत्र देकर वापिस गांव आ गये!

विवाह हुआ आशा देवी से ,1942 में एक बेटी उषा @भवानी हुई पर उनका मन नहीं माना!उन्होंने फिर से ऐयरफोर्स में पायलट पद के लिए आवेदन दिया, साक्षात्कार में उत्तीर्ण हुए पर उसी दौरान अमरीका ने जापान पर एटम बम की वर्षा की जिससे नागासकी व हीरोशिमा में विनाश का मंजर दिखा!इन लोगों की बहाली रद्द हो गयीं और हरिनन्दन बाबू फिर गांव वापिस आ गए!उधर1945 में द्वितीय विश्व युद्ध भी समाप्त हो गया!

हमारे देश में स्वतंत्रता संग्राम चरम पर था!अंग्रेज़ अपनी सत्ता समेट कर जाने की तैयारी में थे! देश का कोष लूट ही चुके थे!उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रियता दिखाई पर साथ ही माध्यमिक विद्यालय मालदाह के हेडमास्टर नियुक्त हुए, फिर उच्च विद्यालय बरबीघा में शिक्षक नियुक़्त हुए! उन दिनों वहां के प्राध्यानाध्यापक स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय जगदीश शर्माजी थे, जोकि आज़ाद भारत में प्रथम शिक्षक विधायक बने!उनके साथ इन गतिविधियों में वे और अधिक सक्रिय हो गए!1947 के हिन्दू मुस्लिम दंगों में ब्रिटिश पुलिस का विरोध स्वर्गीय स्वतंत्रता सेनानी और आज़ाद भारत के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता श्रीकृष्ण प्यारे मोहन उर्फ़ लाला बाबू के साथ श्री हरिनन्दन बाबू ने मुस्लिम बहुल गांव रमजानपुर में खूब किया और काफ़ी सारे मुस्लिम को बचाया!प्रशिक्षित सैनिक का दिल देश प्रेम और इंसानियत से लेबरेज़ जो था!इसी दौरान 1947 में देश को आज़ादी मिली और उनकी दूसरी संतान, एक पुत्र उपेंद्र का जन्म हुआ!

समाजवादी पार्टी की सदस्यता उन्होंने जयप्रकाश नारायणजी के सामने ली थी!अपने गांव में स्कूल का निर्माण अपने हाथों से करवाया! बरबीघा कॉलेज के गोवेर्निंग बॉडी के सदस्य कई वर्षों तक रहे! उन्होंने देश व राज्यओं 

में होने वाली पहले आम चुनाव में विधान सभा चुनाव बरबीघा से सोसालिस्ट पार्टी के टिकट से अपने ही वरिष्ठ मित्र पर काग्रेस पार्टी के श्रीकृष्ण प्यारे मोहन लाला बाबू के सामने, विपक्ष में,खिलाफ लड़े पर हार गए!उन्हीं दिनों उनकी तीसरी संतान जीतेन्द्र का जन्म भी हुआ!लाला बाबू बिहार केसरी बिहार के मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिंहजी जो ताउम्र उस पद पर काबिज रहे, उन के सभी कार्यों के करता धर्ता थे!वे बाद में एम एल ए, एम एल सी, राज्यसभा सदस्य सभी कुछ बने!श्री हरिनन्दन बाबू दोनों के अति प्रिय और करीबी थे!श्री बाबू ने उन्हें कई बार डी एस पी बनने को कहा पर वो तैयार नहीं हुए!वे फिर दोबारा कभी चुनाव लड़े नहीं, अपितु मधु लिमये साहेब ने 1977 के बाद उन्हें जनता पार्टी के समय राज्यसभा सदस्य हेतु बुलाया पर वो रांची चले गए थे!उन्हें खबर नहीं मिली थी!


मुंगेर बंद के दौरान प्रदर्शनकरियों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया!मधु लिमये साहेब पर भी लाठियाँ बरसी जिससे उनका संतुलन बिगड़ा और वे गिर पड़े!उस वक़्त एक प्रशिक्षित सैनिक की भांति वे उन पर सोकर सारी लाठियाँ खुद खाली और उन्हें बचाया!

ऐसे ही एक बार आरक्षण आंदोलन में बरबीघा में भाषण के दौरान स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुरजी पर हुए जानलेवा हमला में खुद मंच पर से गोद में लेकर उनकी जान बचायी!आखिर सेना में मिला प्रशिक्षण कहीं भी काम आ सकता है!कर्पूरी ठाकुर भी बिहार के मुख्यमंत्री बने!

हरिनन्दन बाबू की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने श्री कृष्ण सिंह से लेकर अपनी मृत्युपर्व तक  मुंगेर जिला में समाजवाद का दीपक जलाये रखा!वो स्वार्थ से ऊपर, मानवतावादी व्यक्ति थे जो जीवन में सिद्धांत पर अडिग रहे!वो वेदांत के आग्रही थे!त्याग एवं परउपकार में ही भरोसा था उनका!वो वटवृक्ष की तरह कई पीढ़ियों को अपने सदाचरण से सीख देते रहे!"मास्टरसाब ", उनका पुकारू नाम था!चूँकि कुछ दिनों उन्होंने शिक्षक का कार्य किया था और अंग्रेजी, इतिहास व भूगोल की शिक्षा देते रहे थे! वे बाद में भी अपने शागिर्दों के अनुकरणीय शिक्षक बने रहे!

उनकी मृत्यु सन 1997 के जुलाई महीने में 80 वर्ष की आयु में झारखण्ड के सिंदरी ज़िला में हुई!वहीं दामोदर घाट पर अंतिम संस्कार हुआ और फिर उनके पैतृक गांव खोजागाछी में श्राद्ध सभा किया गया!और उनकी अस्थियों को प्रयागराज में विसर्जित किया गया!उन जैसी सिद्ध हस्तियों पर आज भी हमारी श्रद्धा सुमन अर्पित है!इन कम प्रसिद्ध महान स्वतंत्रता सेनानियों, विभूतियों को देश आज भी सम्मान से याद और नमन करता है!

कलमश्री विभा सी तैलंग


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